Saturday, 1 September 2018

आरक्षण: एक राज्य की सीमा में ही मिलेगा आरक्षण का लाभ — सुप्रीम कोर्ट का महत्वपूर्ण फैसला

आरक्षण: एक राज्य की सीमा में ही मिलेगा आरक्षण का लाभ — सुप्रीम कोर्ट का महत्वपूर्ण फैसला

सुप्रिम कोर्ट का फैसला : एक राज्य की सीमा तक ही मिलेगा लाभ

दूसरे राज्य में आरक्षण का दावा नहीं कर सकते एससी—एसटी

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सुप्रीम कोर्ट ने गुरूवार को कहा कि एक राज्य के अनुसूचित जाति और जनजाति समुदाय के सदस्य दूसरे राज्यों में सरकारी नौकरी में आरक्षण के लाभ का दावा नहीं कर सकते, यदि उनकी जाति वहां एससी—एसटी के रूप में अधिसूचित नहीं है। जस्टिस रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने सर्वसम्मति के फैसले में कहा कि किसी एक राज्य में अनु​सूचित जाति के किसी सदस्य को दूसरे राज्यों में भी अनुसूचित जाति का सदस्य नहीं माना जा सकता, जहां वह रोजगार या शिक्षा के इरादे का लाभ एक राज्य या केन्द्र शासित प्रदेश की सीमा तक ही ​सीमित रहेगा। संविधान पीठ ने कहा कि एक राज्य में अनुसूचित जाति के रूप में अधिसूचित व्यक्ति उस राज्य में अनुसूचित जाति के रूप मे अधिसूचित होने के आधार पर दूसरे राज्य में इसी दर्जे का दावा नहीं कर सकता। एक राज्य के अनुसूचित जाति और जनजाति को दूसरे राज्य की नौकरी में इस जाति को मिलने वाले आरक्षण नहीं मिलेगा। राज्य सरकार एसटी—एससी की सूची मे बदलाव नहीं कर सकती, बल्कि यह राष्ट्रपति के अधिकार के दायरे में है। राज्य सरकार संसद की अनुमति से ही सूची में बदलाव कर सकती है। संविधान पीठ के अन्य सदस्यों में जस्टिस एनवी रमण, जस्टिस आर भानुमति, जस्टिस एस शांतानागौडर और जस्टिस एस अब्दुल नजीर शामिल हैं।
दिल्ली में आरक्षण का लाभ केन्द्रीय सूची के हिसाब से मिलेगा:

जस्टिस भानुमति ने हालांकि राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में एससी—एसटी के बारे में केन्द्रीय आरक्षण नीति लागू होने के संबंध में बहुमत दृष्टिकोण से असहमति व्यक्त की। पीठ ने 4:1 के बहुमत के फैसले में कहा कि जहां तक दिल्ली का संबंध है, तो एससी—एसटी के बारे में केन्द्रीय आरक्षण नीति यहां लागू होगी। संविधान पीठ ने यह व्यवस्था उन याचिकाओं पर दी, जिनमें यह सवाल उठाया गया था कि क्या एक राज्य में एससी—एसटी के रूप में अधिसूचित व्यक्ति दूसरे राज्य में आरक्षण प्राप्त कर सकता है, जहां उसकी जाति को एससी—एसटी के रूप में अधिसूचित नहीं किया गया है। पीठ ने इस सवाल पर भी विचार किया कि क्या दूसरे राज्य के एससी—एसटी सदस्य दिल्ली में नौकरी के लिए आरक्षण का लाभ प्राप्त कर सकते हैं।

एससी—एसटी कानून मामले में कोर्ट के आदेश को पलट चुकी है सरकार:

इससे पहले केन्द्र सरकार सुप्रीम कोर्ट के उस आदेश को पलट चुकी है, जिसमें शीर्ष अदालत ने एससी—एसटी अत्याचार निवारण के मामले में आरोपी की तत्काल गिरफ्तारी पर रोक लगा दी थी। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद देश भर में विराध—प्रदर्शन हुआ था, जिसमें कई लोगों की जानें चली गयी थीं। इसके बाद केन्द्र सरकार ने मॉनसून सत्र के दौरान संसद में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जन​जाति अत्याचार निवारण संशोधन विधेयक—2018 लाया, जिसे सर्वसम्मति से पारित कर दिया गया। सुप्रीम कोर्ट ने इस साल 20 मार्च के अपने एक फैसले में इस कानून के कई प्रावधानों में बदलाव करते हुए इस कानून के तहत तत्काल गिरफ्तारी पर रोक लगा दी थी। फैसले में यह भी कहा गया था कि इस कानून के तहत डीएसपी स्तर के अधिकारी की जांच के बाद प्राथमि​की दर्ज की जा सकेगी। गिरफ्तारी एसएसपी स्तर के अधिकारी के आदेश के बाद ही होगी।
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सरकारी नौकरियों में प्रमोशन में आरक्षण : संविधान पीठ ने पुनर्विचार पर सुनवाई पूरी की, 
फैसला सुरक्षि​त

सरकारी नौकरियों में प्रमोशन में आरक्षण मामले पर गुरूवार को सुप्रिम कोर्ट की संविधान पीठ ने सुनवाई पूरी कर फैसला सुरक्षित रख लिया। प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने एससी—एसटी के कर्मचारियों को प्रमोशन में आरक्षण के बारे में शीर्ष अदालत के 2006 के निर्णय पर सात सदस्यीय संविधान पीठ द्वारा पुनर्विचार के लिए दायर याचिकाओं पर सुनवाई पूरी की। इस मामले में केन्द्र तथा अन्य सभी पक्षकारों को सुनने के बाद पीठ ने कहा कि वह अपनी व्यवस्था बाद में देगी। पीठ सुनवाई कर रही है कि 12 साल पहले के एम नागराज मामले में सर्वोच्च अदालत के फैसले पर पुनर्विचार की जरूरत है या नहीं। 2006 में कोर्ट ने कहा था कि एससी—एसटी के सदस्यों को पिछड़ा माना जाता है और उनकी जाति के तमगे को देखते हुए उन्हें नौकरी में प्रमोशन में भी आरक्षण दिया जाना चाहिए। केन्द्र की ओर से अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने एससी—एसटी कर्मचारियों को प्रमोशन में आरक्षण का लाभ देने की जोरदार वकालत की और कहा कि पिछड़ेपन को मानना ही उनके पक्ष में है। उन्होंने कहा कि एससी—एसटी समुदाय लंबे समय से ​जाति पर आधारित भेदभाव का सामना कर रहे हैं और अभी भी उन पर जाति का तमगा लगा हुआ है।


स्रोत: प्रभात खबर



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